पलायन पीड़ा प्रेरणा (मयंक पाण्डेय )

 

                       


पलायन पीड़ा प्रेरणा

 

             आपदाएं बताकर नहीं आती, और जब आती हैं तो जहाँ अपनी उपस्थिति से जनजीवन को तहस नहस कर देती हैं वहीँ जाते जाते भी हमारे मन मष्तिष्क पर कटु और दुखद स्मृतियों की ऐसी छाप छोड़ जाती है जो समय के साथ धुंधली भले पड़ जाए, उनकी टीस ताउम्र बनी रहती है | ऐसा ही विश्वव्यापी आपदा का समय रहा कोरोनाकाल जिस दौर के आँखों देखे और जीवंत अनुभवों में रची बसी है मयंक पाण्डेय की पहली लेकिन सशक्त और संग्रहनीय किताब “पलायन पीड़ा प्रेरणा” | सशक्त इसलिए कि जब इतिहास के लिए सबकुछ समेटना आसान नहीं होता तब साहित्य उसके सहायक की भूमिका में आगे आता है और मयंक की यह किताब उस कसौटी पर खरी उतरने योग्य है तथा संग्रहनीय इसलिए कि इसमें बहुत कुछ ऐसा है जिसे यादों में संजोये रखने और उससे ताउम्र कुछ सीखने के लिए इस किताब का आपकी बुक शेल्फ पर होना जरूरी है |

वर्तमान में सूरत में संयुक्त आयकर आयुक्त के पद पर कार्यरत मयंक जी का जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में हुआ | विज्ञान स्नातक मयंक दिल्ली विश्वविद्यालय से विधि परास्नातक भी है | संवेदनशील हृदय के मयंक की कहानियां और लेख समय समय पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं |

अपनी किताब के बारे में मयंक लिखते हैं कि “ये किताब उन संघर्षों की कलमबद्ध श्रृंखला है जो किसी परीक्षा, खेल या व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के लिए नहीं, वरन अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किये गए हैं | ये प्रयास है उस भारतीय संस्कार को आपके सामने लाने का जिसके परिणाम स्वरुप लोगों ने संघर्ष कर रहे जरूरतमंदों की तन-मन-धन से सेवा की |”

          इसे पढ़ते हुए लेखक की बात कहीं न कहीं सही सिद्ध होती है क्योंकि किताब में जो ५० सच्ची घटनाएं या यूँ कहें कहानियां हैं उनमे एक ओर जहाँ आपदा से जूझते लोगों के दर्द की पराकाष्ठा की झलक है वही अपनी जीवन्तता और साहस के चलते जीवन से संघर्ष में जीत की उम्मीदों की किरणों को धूमिल नहीं होने देने के तमाम उदाहरण हैं | इनमे से कई कहानियाँ ऐसी भी हैं जिन्हें लॉक डाउन के दौरान घर में रहते हुए हमने टी वी पर देखा और अखबारों में पढ़ा है लेकिन उन कहानियों में छिपी संवेदना को महसूस कर उन्हें कलमबद्ध करने का महत्वपूर्ण काम मयंक ने किया है |

 कोरोनाकाल का प्रभाव वैसे तो कमोबेश हम सबके जीवन पर पड़ा लेकिन कुछ लोग और परिवार ऐसे भी रहे जिन्होंने इस जीवन यात्रा का कठिन संघर्ष भोगा, जीवन और मृत्यु से दो दो हाथ करके परिवार तथा रिश्तों के महत्त्व को समझा तो बहुतों को बहुत कुछ खोकर जीवन का मूल्य समझ आया |

           किताब मुख्यतः दो भागों में है जो काफी कुछ दस्तावेज के लिखे जाने जैसा है लेकिन इससे किताब की रोचकता बिलकुल भी प्रभावित नहीं हुई है | पहला है पीड़ा के इंद्र धनुष जिनमे समय की शिला पर अंकित पलायन की वे व्यथा कथाएं हैं जिन्होंने मानव की जिजीविषा के उच्चतम स्तर को छू लिया है | पढ़ते हुए शुरू में तो लगता है मानों सिर्फ घटनाओं का ब्यौरा हों लेकिन जैसे जैसे आगे पढ़ते हैं कहानियों का मर्म समझ आना शुरू होता है, कहानी के पीछे की दास्तान समझ आती है, जहाँ लेखक की नजर सिर्फ घटनाओं पर ही नहीं उसके पीछे छिपी मानव स्वभाव की कमजोरियों और ताकत के साथ ही उसके मनोविज्ञान पर भी बराबर दिखती है | स्वभावजनित ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, एकदूसरे से आगे निकलने की होड़ से परे एकदूसरे की सहायता, आपसी सद्भाव और अपनों के लिए कुछ भी कर गुजरने का भाव लिए इन घटनाओं का वास्तविक ताप कष्टों के गुजरने से भले अब मंद हो चला हो लेकिन इनसे उदाहरण बनी सच्ची कहानियां प्रेम, मित्रता और संवेदना में मानवता के लिए मिसाल बन चुकी हैं |

   शुरुआत होती है राजमिस्त्री अशोक और नमिता की कहानी से जिन्होंने कई साल पहले घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ प्रेम विवाह किया | उड़ीसा का अशोक चेन्नई में काम करता था और मार्च के पहले सप्ताह में पत्नी को भी अपने साथ चेन्नई ले गया जबकि बेटी और बेटे को दादी के पास छोड़ आया की कुछ समय बाद उन्हें भी अपने साथ ले आएगा लेकिन तभी लॉक डाउन हो गया | दोनों ने स्थिति के सामान्य होने का इंतज़ार किया लेकिन लॉक डाउन बढ़ने की घोषणा से वे अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए | नमिता के आंसुओं से व्यथित अशोक ने ११०० किलोमीटर की यात्रा साइकिल से ही करने का निश्चय किया और निकल पड़ा | लेखक कहते हैं कि “इनके पास न तो पर्याप्त साधन थे न ही धन | इनकी पूँजी थी इनकी हिम्मत, एक दूसरे का साथ और ईश्वर पर भरोसा |”

पूरे रास्ते लाख जिद करने पर भी बिना जरूरत अशोक ने नमिता को साइकिल से उतरने न दिया यहाँ तक पहाड़ी रास्तों पर भी खुद पैदल चला लेकिन नमिता को साइकिल पर बैठाए रखा | पति पत्नी के प्रेम की मिसाल बने अशोक को गर्व है कि उसने नमिता का पूरा ध्यान रखा |

  “अशोक और नमिता की इस यात्रा में समाज के विभिन्न वर्गों की मानवता भी प्रतिबिंबित होती है, बकौल अशोक एक दो जगहों को छोड़कर बाकी हर जगह लोगों ने दिल खोल कर मदद की | अशोक ने सोचा ही नहीं था कि उसे रास्ते में इतना सहयोग मिलेगा | वसुधैव कुटुम्बकम की धारण पर चलता ये देश और इसके निवासी संकट के समय अपने सामर्थ्य के अनुसार दूसरे देशवासी की मदद को सदा तत्पर रहते है |”

रामू के पुष्पक विमान की घटना जितनी रोचक है उतनी है मार्मिक भी कि कैसे आवश्यकताएं किसी आविष्कार की वजह बन जाती हैं | अपनी ८ माह की गर्भवती पत्नी और दो साल की बच्ची के साथ हैदराबाद में फंसे रामू ने जेब में मास्क खरीदने तक के पैसे न होने पर भी पत्नी को ८०० किलोमीटर दूर घर सकुशल ले जाने की पहाड़ जैसा इच्छा को फलीभूत किया | “रामू ने बांस व अन्य लकड़ियों  की मदद से एक बेस बनाया जिस पर पत्नी व बच्ची को बैठाया जा सके | इसके बाद रामू ने इसमें चार पहिये लगाये जिसकी मदद से वो उनका बोझ उठाकर चल सकें | इस पूरी गाड़ी में सड़क पर पड़ा एक ट्यूब लगाया जिससे वह इस गाड़ी को खींचता हुआ आगे बढ़ सके |”

सुनने में ये बातें जितनी आसान लग रही हैं काश सचमुच होती | सुनसान जगहों पर बिना संसाधनों के अच्छे अच्छों के दिमाग काम करना बंद कर देते हैं लेकिन रामू ने हार नहीं मानी और उसकी हाथगाड़ी खींचती हुई तस्वीर अखबारों में खूब वायरल हुई थी | अपने परिवार के लिए कठिन से कठिन परिस्थिति से जूझने और उस पर सबकुछ न्योछावर करने की भावना का परिचय देता रामू बस इतनी सी बात पर खुश है कि उसने अपने परिवार को पैदल नहीं चलाया |

कुछ ऐसी ही कहानी राकेश और शकुंतला की है अंतर बस इतना कि नौ माह की गर्भवती शकुंतला को राह में ही प्रसव पीड़ा से गुजरना और मई की चिलचिलाती गर्मी में सड़क के किनारे ही बच्चे को जन्म देना पड़ा जिसमे सहायक बनी उन्ही की तरह पलायन कर रहे समूहों की कुछ स्त्रियाँ | यही नहीं बच्चे को जन्म देने के महज दो घंटे के आराम के बाद ही वो फिर से उठकर चल पड़ी और ६० – ७० किलोमीटर की दूरी पैदल चलकर तय की तब जाकर सरकारी सहायता प्राप्त हो सकी | इस दम्पति ने इतने विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं छोड़ी और एक दूसरे का साथ बनाये रखा |  

अपने दिव्यांग बच्चे के लिए साइकिल चुराने की घटना हो या एक किशोरी के अपने बीमार पिता को साइकिल पर बिठाकर सैकड़ों मील की दूरी तय करना, मुंबई से अयोध्या पैदल चले, भीख मांगकर गुजारा करने वाले तीन बुजुर्ग दोस्तों राधेश्याम, अब्दुल और ज़मीर (जिनमे दो नेत्रहीन थे) की कहानी हो या अलग अलग धर्मों के लेकिन दोस्ती की मिसाल कायम करने वाले दोस्तों अमृत और कयूम की, लेखक ने सभी तत्कालीन घटनाओं के पीछे छिपे मानवीय रूप को अपनी लेखनी से पहचान देने की कोशिश की है | यही नहीं लेखक कोरोना के बहाने अंधविश्वास पर भी बात करते हैं कि कैसे रतलाम के तांत्रिक बाबा झाडफूंक से कोरोना का इलाज करते करते खुद कोरोनाग्रस्त होकर दुनिया से कूच कर गए | यह अंधविश्वासों पर आँख मूँद कर भरोसा करने वालों के लिए कड़वा सबक है यानि लेखक की नजर से कोई भी घटना अछूती नहीं रह गयी है |

    कहानी दर कहानी किताब ऐसे बाँध कर रखती है कि इसकी कहानियां पाठकों की अपनी कहानियाँ बन जाती हैं, इसमें प्रभावित लोगों की पीड़ा उसकी अपनी पीड़ा बन जाती है और अपनी मंजिल तक पहुंचते लोगों की ख़ुशी की झलक वह अपने हृदय में महसूसता है | कहानियों में लेखक ने जहाँ पुरुषों की बहादुरी की अनेक घटनाओं की चर्चा की है वहीँ ऐसी तमाम घटनाओं की और भी ध्यान दिलाया है जिसमे स्त्रियों और नन्हे मुन्ने बच्चों ने अपने अदम्य साहस से उनके साथ कंधे से कंध मिलकर अपनी भागीदारी दिखाई है | दरभंगा की ज्योति, गोरखपुर की पूनम, लखनऊ की उज़मा, गुडगाँव के सात बच्चे हों या अररिया का ग्यारह साल का तबारक सबने अपनी क्षमताओं से आगे बढ़कर परिवार और समाज के लिए जो किया वो अनुकरणीय है और रहेगा | पीड़ा के उन पलों में कैसे सारा देश एक हुआ और हर वर्ग के लोगों ने अपनी सीमित या असीमित आर्थिक क्षमता से अधिक आगे बढ़कर अपने मनुष्य होने को सिद्ध किया जो सदियों तक याद किया जाता रहेगा |

किताब का दूसरा भाग प्रेरणा है जिसमे विपत्ति के उस समय में देश और समाज के लिए अनुकरणीय बने लोगों के बारे में लिखा गया है | चाहे सामान्य लोग हों या प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर या पैरा मेडिकल स्टाफ, पुलिस या समाजसेवी संस्थाएं सबसे बारे में लेखक ने लिखा है | फिल्म कलाकार सोनू सूद और सेलेब्रिटी शेफ विकास के जीवन संघर्ष और कोरोनाकाल में उनके कार्यों के बारे में विस्तार से चर्चा है जो किसी के लिए भी प्रेरणा स्रोत हो सकते है | उस संकटकाल में जब हममे से अधिकतर महीनों घरों से बाहर नहीं निकले इन लोगों ने ज़मीन पर उतरकर पीड़ितों के दुःख बांटे उनकी परेशानियां समझीं और कन्धों पर हाथ रखकर उनका सहारा बने |  

  वैसे तो किताब इतनी सच्ची है कि स्वतः रोचक बन पड़ी है लेकिन लेखक का गीत प्रेम कुछ यादगार पंक्तियों के रूप में जगह जगह सोने पर सुहागा का काम करता है | टी वी पर देखी सुनी इन्ही घटनाओं पर जहाँ मन सरकार और सरकारी योजनाओं के प्रति आक्रोश से भर जाता था, इस किताब में उन्ही का वास्तविक का वर्णन और जन सहयोग का जिस मार्मिकता से किया गया है वह प्रशंसनीय है | पठनीय किताब |

प्रलेक प्रकाशन मुंबई 

मूल्य- 250                                                           

                                                                 भारती पाठक

  

 

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