होना अतिथि कैलाश का (मनीषा कुलश्रेष्ठ )

                                                                 होना अतिथि कैलाश का   

         कुछ किताबों को पढ़ते हुए बीच में छोड़ना आसान नहीं होता क्योंकि वे हमें किसी अदृश्य मोह में बांधे अपने साथ किसी और ही लोक में ले जाती हैं वहां जहाँ सूक्ष्म और स्थूल के बीच कोई अंतर  नही रह जाता है | ऐसी ही एक किताब है “होना अतिथि कैलाश का” जिसे लिखा है सुप्रसिद्ध लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ जी ने | यह यात्रा प्रेमी लेखिका का पहला यात्रा वृत्तांत है |

मनीषा कुलश्रेष्ठ जी का जन्म जोधपुर में हुआ | ये विज्ञान स्नातक और हिंदी साहित्य से परास्नातक और एम फिल के साथ ही कत्थक में विशारद हैं | पिछले पचीस सालों से वे कथा साहित्य लेखन में सक्रिय हैं | अब तक इनके सात कहानी संग्रह और छः


उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं जो राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहे गए हैं | इनके उपन्यास मल्लिका को काफी पसंद किया गया और हाल ही में उसे ‘इंदु शर्मा कथा सम्मान’ २०१९ के लिए चयनित किया गया |

    मनीषा जी की कई कहानियों और उपन्यासों का अंग्रेजी, डच और रुसी सहित कई भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है | आप विश्व हिंदी सम्मलेन जोहान्सबर्ग में शिरकत के अलावा हायडलबर्ग, जर्मनी में उपन्यास पाठ के लिए भी जा चुकी हैं | इन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी का रांगेय राघव सम्मान, घासीराम वर्मा पुरस्कार, कृष्ण प्रताप कथा सम्मान, गीतांजलि इंडो फ्रेंच लिटरेरी प्राइज़, वनमाली कथा सम्मान, ढींगरा फाउंडेशन का अंतर्राष्ट्रीय कथा सम्मान, के के बिरला फाउंडेशन का बिहारी सम्मान  सहित कई महत्वपूर्ण सम्मान व फैलोशिप प्राप्त हुई है |

     जिस किताब की मैं चर्चा कर रही वह समर्पित है - “कैलाश को, जिसमे पास मेरे असंख्य अस्तित्वगत सवालों का एक ही जवाब था, विराट मौन !” ये पंक्तियाँ लिखते हुए लेखिका को भले अपने सवालों के जवाब मौन में प्राप्त हुए हों किन्तु उस मौन की ध्वनि में भी कितनी मधुरता कितना रहस्यमय आकर्षण है, यह इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ने वाला पाठक, लेखिका की दृष्टि से कैलाश के साक्षात् दर्शन करते हुए सहज ही महसूस कर लेता है | वे एक घुमक्कड़ मन की लेखिका हैं शायद इसीलिए स्वयं कैलाश ने उन्हें आतिथ्य का अवसर दिया |

“ यात्रा क्या है ? कुछ लोगों के लिए रास्ते का आनंद, कुछ के लिए पलायन, कुछ लोगों के लिए नए लोगों, नयी जमीनों, नए मौसमों से मिलने का बहाना |” ये किसी भी यात्रा से पहले की सोच हो सकती जिसके साथ लेखिका ने शुरुआत की है लेकिन कैलाश से साक्षात्कार एक यात्रा से कहीं बढ़कर कुछ है जिसका अनुभव वही कर सकता है जिसे उस महाकाल से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हो | आगे वे लिखती हैं कि -

    “जो कैलाश की तरफ पहला कदम उठाते हैं वे जानते हैं कि न तो यह केवल तीर्थ यात्रा है, न ही यह रोमांच का सफ़र है | यह अपने मनोबल और देह की सीमाओं से आगे बढ़कर किसी आतंरिक दुनिया की खोज की शुरुआत है | कैलाश के निकट पहुँच कर आप समय की अनंतता के परिप्रेक्ष्य में जीवन के सार को समझना आरम्भ कर देते हैं | चाहे फिर आप आस्तिक हों या नास्तिक |”

    सच यही है कि कैलाश जाना या जा पाना एक आम यात्रा नहीं है | यह तो विशेष तैयारी मांगती   है | तैयारी सिर्फ तन की शक्ति ही नहीं मन की एकाग्रता की भी जो राह में आने वाली कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कराये | लेखिका ने यात्रा पूर्व की जाने वाली तैयारियों से लेकर वहां जाने और पहुँचने के सभी संभावित मार्गों और उनसे जुड़े खर्च का ब्यौरा विस्तार से दिया है कि किसी भी नए यात्री के लिए अपनी सुविधानुसार वहां पहुँचने की आरम्भिक जानकारी सहज ही हो जाए | शिव से साक्षात्कार क्या इतना आसान है ? आरंभिक तैयारियों के बारे में लेखिका बताती हैं कि महीनों जिम में पसीना बहाकर शरीर को इस लायक बनाया कि यात्रा में आने वाली परेशानियों को सहज झेला जा सके |

    यात्रा हमेशा प्रसन्न करे यह भी संभव नहीं, तो कई बार नैराश्य घेर लेता मन में और कई बार वैराग्य भी | एक कहता है कि आगे मत जाओ जीवन से बढ़कर कुछ नहीं वही दूसरी और वैराग्य भाव कहता है कि इसी कैलाश पर ही जीवन की सार्थकता है | कैलाश के बारे में बचपन में सुनी बातों में उसकी दिव्यता को महसूसती लेखिका अपनी यात्रा शुरू करती हैं जिसमे उनके पति के अलावा कुछ गुजराती परिवार भी हैं जिनके पास आस्था ही एकमात्र सूत्र है उस महायोगी तक पहुँचने का | उनके लिए शारीरिक तैयारियां किसी जरूरी सूची में नहीं आती | सूची में है शिव की भक्ति और उसकी पुकार जिसके आसरे उन्होंने कैलाश की और कदम बढा दिए हैं | जहाँ लेखिका रास्ते में पहनने वाले कपड़ों और जरूरी सामानों को लेकर सचेत है वही गुजराती महिलायें गाइड के तमाम समझाने के बावजूद अपने पारंपरिक वेशभूषा में ही चल पड़ी हैं |

   यात्रा का मार्ग नेपाल से होकर चुना था उन्होंने जो कम समय लेता है और अन्य मार्गों की अपेक्षा कम खर्चीला भी है | उनके ट्रेवल पैकेज में काठमांडू घुमाने का भी कार्यक्रम था तो लेखिका ने काठमांडू के बारे भी काफी जानकारियाँ और अपने अनुभव किताब में लिखे हैं | एक सबसे अच्छी बात जो इस किताब में है कि ऐसी यात्राओं में एक महिला होने पर जो व्यवहारिक और शारीरिक कठिनाइयाँ आती हैं उनके समाधान के बारे में भी लेखिका ने अनावश्यक संकोच हटा कर के लिखा है जो निश्चित तौर पर किसी महिला को भी ऐसी यात्राओं को न सिर्फ पढ़ने बल्कि यात्राओं से दो चार होने के लिए प्रेरित करता है |

       लेखिका प्रकृति को लेकर जहाँ बहुत संवेदनशील हैं वहीँ पर्यावरण संकट को लेकर जागरूक भी  हैं | बढ़ते हुए उपभोक्तावाद में आस्था और धार्मिक मान्यताओं के नाम पर मानसरोवर जैसी पावन जलराशि को दूषित करने, परिक्रमा मार्ग में अस्थायी डेरों पर कचरा फैलाने, मलमूत्र सम्बन्धी गन्दगी फैलाने और मना करने के बावजूद मानसरोवर के तट पर हवन, स्नानादि करने पर वह अपना विरोध दर्ज करती हैं |

 वे बताती हैं कि- “परिक्रमा मार्ग जगह जगह कचरा पात्र रखे हुए थे लेकिन कोई भी भारतीय यात्री इनका इस्तेमाल नहीं कर रहा था | मैंने देखा लोग प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतल और चाकलेट रैपर्स फेंकते जा रहे थे और घोड़े वाले जो थे या तिब्बती लोग थे उनको उठा उठा कर कचरे के डिब्बे में फेंक रहे थे | हम भारतीयों की इस गन्दी आदत से मैं बार-बार शर्मिंदा होती हूँ |”

     यानि सिर्फ आँख मूँद कर हर-हर महादेव की जय जयकार करना ही सच्ची आस्था नहीं बल्कि उसी महादेव की धरती को पवित्र रखना भी हमारी ही जिम्मेदारी है | लेखिका कैलाश की पौराणिक और भौगोलिक अवस्था के साथ ही उससे जुडी धार्मिक मान्यताओं की भी जानकारी वैज्ञानिक साक्ष्य के साथ देती  हैं |

   “वैसे तो तिब्बत विश्व मानचित्र पर स्वायत्त दर्शाया जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि यहाँ का सारा प्रशासन चीन सरकार ही चलाती है | सभी जगह चीन के झंडे ही लहराते हैं और समय भी यहाँ पर चीन का ही लागू होता है |...... तिब्बत के लोग यहाँ चुपचाप रह सकते हैं, छोटी मोटी मजदूरी, छोटा मोटा व्यवसाय, खेती और पशुपालन कर सकते हैं | बगावत करने वालों को अक्सर जेल क्या कई बार मृत्यु नसीब होती है |” भले ही हम सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में तिब्बत के बारे में स्वायत्त होना पढ़ते आ रहे हों लेकिन यथार्थ उससे कही अलग और कटु है |

  किताब में सिर्फ यात्रा ही नहीं रिश्तों की नर्माहट और गर्मी भी है जो कभी तो पढ़ने वाले के मन को हल्के से सहला जाती है और कहीं कहीं उसका ताप हृदय को उष्ण रखता है | कैलाश की यात्रा हर संभावना को लेकर संयत भी करती है | यात्रा के आरम्भ में जब लेखिका दम्पति बच्चों को अपने बैंक आदि की पूरी जानकारी देते हैं तब बेटी कहती है कि- “प्लीज डराइये मत !”

इस पर लेखिका कहती हैं कि “बेटा, यह बस एहतियातन है | अब देख न, हमें अपने एग्रीमेंट में भरना पड़ा न कि अगर हमें वहां कुछ हो जाता है तो हमारी बॉडीज को वहीँ .......इसका मतलब यह थोड़े कि.....” यह सुनकर उसकी बड़ी बड़ी आँखों में आंसू आ गए |

   यही नहीं ये यात्रा उनके दांपत्य प्रेम के अनेक मधुर क्षणों की साक्षी भी बनती है जहाँ उनके पति हर हाल में उनके साथ खड़े हैं | “मैं और अंशु मध्यरात्रि आसमान में होते उल्कापात की आतिशबाजी देखते रहे | वे युवक इस उल्कापात को जाने क्या मान हाथ जोड़े मूर्तिवत जड़ खड़े थे | मैंने जब जम्हाई ली तो अंशु ने कहा कि चलो सोयें | जब हम अपने माटी लिपे कमरे में घुसे, तब रात के एक बजे थे | बिस्तर ठंडा था मगर चारा ही क्या था ? हम लिपटकर एक ही बिस्तर में घुस गए और एक दूसरे के निर्मल सुखद आगोश में तुरंत सो गए | पचास पार होकर भी दांपत्य की विविधता को पल पल सीखती हूँ | हम उस पल दो अनाथ शिशु थे जो जम्बूद्वीप से निकल अनजान भूभाग पर भटकते आ गए थे |” एक ऐसा अनुभव जो मन को किसी भी सीमा से परे ले जाकर असीम तृप्ति में सराबोर कर दे |

   जहाँ कैलाश परिक्रमा के दौरान प्रकृति के सौन्दर्य में खोयी लेखिका एक बड़ी चट्टान के दरकने की आवाज को किसी जंगली जानवर की आवाज समझ कर अपनी जगह पर खड़ी रह गयीं तो एक तिब्बती गाइड ने किसी तरह उन्हें धकेल कर जान बचाई वहीँ दूसरी ओर गौरीकुंड में जल लेने उतरे उनके पति किसी साथी यात्री की जान बचाने की पूरी कोशिश के बाद भी उसे बचा नहीं सके ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं से उपजे शून्य पर लेखिका लिखती हैं कि –

“अंशु मेरा हाथ पकड़कर चुपचाप ढलान पार कराते रहे | मेरी आँखों से आंसू बह रहे थे | हाँ, कैलाश आपसे कुछ नहीं मांगता, लौटाता जरूर है आपको, आपका शून्य | आपका अहम चूर्ण हो जाता है और आपकी आत्मा बस अमूर्त श्लोक अपनेआप बुदबुदाने लगती है |”

यह कोई काल्पनिक कथा नहीं अपनी स्वेच्छा से भोगा गया यथार्थ है जिससे होकर गुजरने के लिए भी सौभाग्य चाहिए | किताब में प्रकृति से से जुडी तमाम जानकारियाँ भी हैं जिसके बारे में लेखिका बताती रहती हैं | वहीँ कई जगह प्रकृति के रौद्र रूप के भी दर्शन कराती हैं जब मृत्यु या जीवन की लड़ाई के बीच कुछ क्षणों का ही फर्क दीखता है | हम मैदानों में रहने वाले जहाँ सड़क में आने वाले मामूली गड्ढों पर जाने कितनी हाय तौबा मचाते है वही पहाड़ों का जीवन देख कर दांतों तले ऊँगली दबाने को मजबूर होना पड़ता है |

“हम आधे घंटे में ७ किलोमीटर भी नहीं बढे होंगे कि फिर गाड़ी को ब्रेक लग गए | फिर लैंड स्लाइड.....इस बार लाइव डेमोंसट्रेशन था, सामने से गिरते धसकते पहाड़ की धूल और कीचड उछलता देखा जा सकता था |..........मुझे लगा पत्थरों का स्थिर ढेर है, निकल जायेंगे | अब इधर से उधर ही तो जाना है | एक हद के बाद खतरे भी आदत बन जाते हैं | मैं अपना बैग जैकेट हाथ में लिए चली कि सामने का दृश्य देख कर मेरे भी छक्के छूट गए | वहां तो एक ढहा हुआ पथरीला मलबा था, जो अब भी खिसक रहा था | जिसपर चढ़कर अब भी लोगों की चीखें निकल रही थीं |”

   प्रकृति के रहस्यों को समझना सदा से ही मनुष्य का प्रिय शगल रहा है और इसी की कड़ी है हिमालय और उसकी पर्वतश्रेणियां | इनमे एवेरेस्ट से कम ऊंचाई पर होने के बावजूद कैलाश सबसे रहस्यमय और उस तक पहुँचना उतना ही दुर्गम | लेखिका लिखती हैं कि- “कैलाश केवल एक पवित्र तीर्थ मात्र होता तो कोई उल्लेखनीय बात नहीं थी | यह वर्तमान का एक प्राकृतिक, सांस्कृतिक, चीनी साम्यवाद और तिब्बत की विडम्बना का राजनैतिक यथार्थ भी है |” यही नही लेखिका पुराणों में वर्णित अलका नगरी की खोज भी करती है और कई जगह अनुमान लगाती हैं कि क्या सचमुच कालिदास वर्णित अलका नगरी यही कहीं थी |

जैसे सच्चे मन से की गयी प्रार्थनाएं फलीभूत होती है ठीक वैसे ही दृढ़ निश्चय और पूरे मन से की गयी लेखिका की यात्रा भी पूरी होती है जिसके अनुभव का लाभ उन सभी के लिए है जिन्हें कैलाश से साक्षात्कार की लालसा है |

    लेखिका स्वयं कहती हैं कि- “अपनी इस यात्रा के कितने ही सूक्ष्म अनुभवों को तो मैं शब्द ही नहीं दे सकूंगी, लेकिन मेरा प्रयास रहा है कि मैं बाह्य यात्रा के साथ अपने अंतस की यात्रा को भी शब्द दे सकूँ | मैं यही कहूँगी कि कैलाश तीर्थयात्रा नहीं यह स्वयं से साक्षात्कार की और प्रकृति से तादात्म्य की यात्रा है | सोने में सुहागा तो तब हो कि यह पुस्तक अन्य कैलाश परिक्रमा की वांछा करने वालों के लिए पथ प्रदर्शक साबित हो |”

किताब अपनी भाषा के सरल होने के साथ ही न सिर्फ यायावरों को आकर्षित करने वाली है वरन इतिहास और पर्यावरण पर कुछ अच्छा पढ़ने वालों के लिए भी पठनीय है | शेष पढ़कर .......

                                               

                                                             भारती पाठक

 

 

  

   

 

 

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